शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

दोहावली

ठहर न इस ठांव मनुवा, जाना दूसरे ठांव ।
मिटे जहां ठाठ मनुवा, मिलते शीतल छांव ।।

तुम होगे हंसा गगन, काया होगी ठाट ।
तुम तो हो पथिक मनुवा, जीवन तेरा बाट ।

कर्मो की मुद्रा यहां, पाप पुण्य का  हाट ।।
क्या ले जायेगा साथ, झोली भर ले छाट ।।

ले जाते हैं उपहार, कुछ ना कुछ उस धाम ।
कर्मों की ही पोटली, आते हैं जहां काम ।।

दुख की निशा में छुपता, सुख रवि का प्रकाश ।
कष्टों की बेला काट, लिये भोर की आस ।।

प्राणि प्राणि में है प्राण, तुम सा ही है मान ।
अपने ही सुख दुख भांति, सबका सुख दुख जान ।।
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