रविवार, 27 अक्तूबर 2013

लोकतंत्र करे अपील (छंदमाला)



दोहा
बज रहे बड़े जोर से, चुनावी शंखनाद ।
अब साम दाम भेद से, चल रहा शाह मात ।।

सोरठा
लोकतंत्र पर्व एक, उत्सव मनाओं सब मिल ।
बढ़े देश का मान, कुछ ऐसा करें हम मिल ।।

ललित
वोट का चोट करें गंभीर, अपनी शक्ति दिखाओं ।
जो करता हो देश हित काज, उनको तुम जीताओं ।।

गीतिका
देश के सब वोटर सुनो, आ रहा चुनाव अभी ।
तुम करना जरूर मतदान, लोकतंत्र बचे तभी ।।
राजनेता भ्रष्‍ट हों जो, बंद मुख उनका करें ।
लालच चाहे जितना दें, लोभ में न कभी पड़े ।।

कुण्डलीय
हे पढ़े लिखे भद्रजन, लोकतंत्र करें अपील ।
तुम देश के रीढ़ बनो, सभी रहो हिलमील ।।
सभी रहो हिलमील, देश हित एक काम करो ।
निज काम छोड़ अभी, अपना मतदाना करो ।।
कह ‘रमेश‘ समझाय, देशहित सबसे ऊपर ।
चयन करो भले लोग, पढ़े लिखे भद्रजन हे ।।

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-रमेशकुमार सिंह चौहान

शनिवार, 5 अक्तूबर 2013

गजल-मेरे माता पिता ही तीर्थ हैं हर धाम से पहले




मेरे माता पिता ही तीर्थ हैं हर धाम से पहले

चला थामे मैं उँगली उनकी नित हर काम से पहले

उठा कर भाल मै चिरता चला हर घूप जीवन का,

बना जो करते सूरज सा पिता हर शाम से पहले


झुकाया सिर कहां मैने कही भी धूप से थक कर,

घनेरी छांव बन जाते पिता हर घाम से पहले

सुना है पर कहीं देखा नही भगवान इस जग में

पिता सा जो चले हर काम के अंजाम से पहले

पिताजी कहते मुझसे पुत्र तुम अच्छे से करना काम
तुम्हारा नाम भी आएगा मेरे नाम से पहले

......................रमेश.....................

दोहावली

ठहर न इस ठांव मनुवा, जाना दूसरे ठांव ।
मिटे जहां ठाठ मनुवा, मिलते शीतल छांव ।।

तुम होगे हंसा गगन, काया होगी ठाट ।
तुम तो हो पथिक मनुवा, जीवन तेरा बाट ।

कर्मो की मुद्रा यहां, पाप पुण्य का  हाट ।।
क्या ले जायेगा साथ, झोली भर ले छाट ।।

ले जाते हैं उपहार, कुछ ना कुछ उस धाम ।
कर्मों की ही पोटली, आते हैं जहां काम ।।

दुख की निशा में छुपता, सुख रवि का प्रकाश ।
कष्टों की बेला काट, लिये भोर की आस ।।

प्राणि प्राणि में है प्राण, तुम सा ही है मान ।
अपने ही सुख दुख भांति, सबका सुख दुख जान ।।