गुरुवार, 23 मई 2013

जनक भगवान समान


   
    जिसका मैंने ऊंगली पकड़कर चलना सीखा,
    जिसने  मेरे लिये चला घोड़ा सरीखा ।

    मेरे चलने से जिसके मुह से वाह निकला,
    मेरे गिरने पर जिसके मुह से आह निकला ।

    मेरी हर छोटी बड़ी जरूरतो का जिसने रखा ध्यान,
    जिसने अपने मुॅंह का निवाला मुझ पर किया कुर्बान ।

     जीवन जीने का जिसने सलीखा सिखाया,
    जिसने पसीने का हर कतरा मेरे लिये बहाया ।

    जिसका खुन जीवन बन मेरे नषों में दौडता,
    मेरा अंग प्रतिअंग बस......... यही है कहता ।

    जिसने  अपना जीवन मुझे सर्मित किया
    जिस पर मैं करू अपना जीवन कुर्बान ।
   
    जो मेरे लिये सारी दुनिया से है महान
    जो हैं मेरे जनक......भगवान समान ।।


.................रमेश.....................
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