गुरुवार, 23 मई 2013

हे विधाता






हे विधाता
हे विधाता नही बदनला मुझे तेरा विधान,
हर दुःख- सुख में मेरा कर दे तू कल्याण ।
चाहे जितना कष्ट मेरे भाग्य में तू भर दे,
पर हर संकटों से जुझने का मुझे तू संकल्प दें ।

जो संकट आये जीवन में उनसे मैं दो दो हाथ करू,
संकट हो चाहे जितना विकट उनसे मै कभी न डरू ।
चाहे मेरे हर पथ पर कंटक तू बिखेर दें,
पर उन कंटकों में चलने का साहस मुझमें भर दें ।

कष्टो से विचलित हो अपनी मानवता धर्म कभी न भूलू,
हर जीवो के पथ के कंटकों को अपनी झोली में भर लू ।
चाहे मेरे जीवन को अश्रु धारा से भर दें,
पर अश्रु सागर को पीने मुझे अगस्त-सा तू कर दें ।

जीवन के किसी खुशी से मैं न बौराऊ,
अपनी खुशी में किसी को न सताऊ ।
चाहे जितनी खुशियां मेरी झोली में भर दे,
पर हर खुशीयों में मुझे जनक-सा तू कर दें ।।
.............रमेश‘‘........................





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