मंगलवार, 21 मई 2013

हे मानव

हे मानव तुम मानवता को क्यों रहे हो भूल ।
मनव होकर दानव होने पर दे रहे हो तूल ।

धर्मरत कर्म पथ पर आगे बढ़ने का जो था मान ।
शांति और पथ प्रदर्षक का जो था सम्मान ।।
आज हमारे मान सम्मान फांसी में रहे हैं झूल ।
हे मानव तुम मानवता को क्यों रहे हो भूल ।।

जियो और जिने दो का नारा करके बुलंद ।
अपनी ही मस्ती में मस्त क्यो हो मतिमंद ।।
अपनी खुशी के लिये दूसरों को क्यों देते हो शूल ।
हे मानव तुम मानवता को क्यों रहे हो भूल ।

हर बाला देवी की प्रतिमा जहां बच्च बच्चा राम है ।
हर प्रेमिका राधा राधा हर प्रेमी जहां श्याम है ।।
वात्सलाय के इस धाम में वासना कैसे गया घुल ।
हे मानव तुम मानवता को क्यों रहे हो भूल ।

हिन्दु मुसलिम सिक्ख ईसाई से पहले मानव हो कहलाये ।
फिर क्यों मानव होकर मानव को मजहब के नाम पर बांट खायें ।।
मानव का परिचय मानव न होकर होगया जाति धरम और कुल ।
हे मानव तुम मानवता को क्यों रहे हो भूल ।
.................‘‘रमेश‘‘......................
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